आंदोलन के नाम पर अराजक हिंसा, राष्ट्र की अस्मिता पर हमला – अरविन्द सिसोदिया
कोटा। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी एवं वरिष्ठ बुद्धिजीवी अरविन्द सिसोदिया ने कहा कि, “कथित छात्र आंदोलन पूरी तरह अराजक तत्वों द्वारा हाईजैक किया जा चुका है। पत्थरबाजी और हिंसा इसमें सम्मिलित हो गई है। यह आंदोलन नहीं, बल्कि सोची-समझी योजना के तहत देश की व्यवस्था पर किया गया आक्रमण है। इसमें विपक्षी दल अपने-अपने हित साधने के साथ-साथ समानांतर प्रतियोगिता करते भी नजर आ रहे हैं। इस तरह के हिंसक गतिविधियों का लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है। ”
सिसोदिया नें कहा कि ” पूर्व में भी सीएए के नाम पर, किसानों के नाम पर, पहलवानों के नाम पर, वोटचोरी के नाम पर छलपूर्ण आंदोलन देखे गये हैं। मुद्दाहीन विपक्ष आंदोलन के नाम पर आराजकता उत्पन्न करने कि कोशिश करता रहा है। यह भी उसी तरह की कोशिश है।”
उन्होंने कहा कि, “पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और छात्रों के भविष्य से जुड़े गंभीर मुद्दों के नाम पर शुरू हुआ कथित आंदोलन, यूँ तो प्रारंभ से ही भारतीय युवाओं के साथ विदेशी ताकतों का छल तथा उनके माध्यम से देश में अराजकता उत्पन्न करने का बड़ा षड्यंत्र है। जंतर-मंतर पर आंदोलनकारीयों द्वारा की गई पत्थरबाजी, सुरक्षा तंत्र पर हमला तथा भारत-विरोधी नारेबाजी ने पूरी तरह उसका असली चेहरा उजागर कर दिया है।”
सिसोदिया ने कहा कि, ” वहीं विपक्षी राजनीतिक दलों के बीच श्रेय लेने की होड़ ने इसे इंडी गठबंधन की टूट-फूट का अराजक सर्कस बना दिया है। जिस आंदोलन का केंद्र छात्रों की पीड़ा और युवाओं का भविष्य होना बताया जा रहा था, उसमें अति-साम्यवादी दलों के उग्र छात्र संगठनों की हिंदुत्व-विरोधी और भारत-विरोधी ढपली बज रही थी। इसमें तयसुदा हिंसावाद का समावेश और विपक्षी दलों के शक्ति-प्रदर्शन और नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा नें पूरी तरह अनियंत्रित और मनमाना बना दिया है।”
सिसोदिया ने कहा कि, “पूरे घटनाक्रम पर नजर डालें तो जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन में कई विपक्षी दल आराजकता की मानसिकता से सक्रिय हैं। उनके छात्र संगठन और कार्यकर्ता सम्मिलित हैं। वहीं कांग्रेस ने अपने राजकुमार राहुल गांधी के नेतृत्व में अचानक प्रधानमंत्री आवास तक मार्च छात्रों के मुद्दे पर लापता जैसी हालत में चल रहे राहुल गांधी के पक्ष में इसे हड़पनें का सक्रिय प्रयास रहा है ।”
सिसोदिया ने कहा कि, “यह पूरा घटनाक्रम विपक्ष के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा को भी उजागर करता है। एक ओर राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का केंद्रीय चेहरा बनने का प्रयास कर रहे हैं, तो दूसरी ओर अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव और अन्य क्षेत्रीय दल अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखने तथा आंदोलनों में अपनी प्रमुख भूमिका स्थापित करने में जुटे हैं। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि विपक्ष के भीतर नेतृत्व और राजनीतिक श्रेय की भी समानांतर लड़ाई चल रही है।”
सिसोदिया ने कहा कि, “यूँ तो यह आंदोलन छात्र हितों का कभी था ही नहीं, बल्कि भारतीय युवाओं को अराजकता के लिए उकसाकर चोर रास्ते से सत्ता-प्राप्ति का षड्यंत्र है। दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि इस षड्यंत्र को विपक्षी दल अच्छी तरह समझ-बूझकर भी बहती गंगा में हाथ धोने की तरह कूद पड़े हैं और स्थिति को बिगाड़ रहे हैं।”
उन्होंने कहा कि, “विपक्ष के पास युवाओं के भविष्य जैसे मूल मुद्दों और उनके ठोस समाधान पर कोई चर्चा नहीं है, जबकि राजनीतिक बयानबाज़ी, शक्ति-प्रदर्शन और पूरे आंदोलन को अपने पक्ष में खींचने का संघर्ष दिखाई दे रहा है।”
सिसोदिया ने कहा कि, “विपक्षी राजनीतिक दलों को यह स्मरण रखना चाहिए कि छात्रों के भविष्य से खेलकर सत्ता परिवर्तन या नेतृत्व स्थापित करने का चोर रास्ता कभी सफल नहीं होगा। भारत में सत्ता का गठन भारत के लोग मतदान के जरिए करते हैं। यहाँ नेपाल या बांग्लादेश जैसे देशों का एपिसोड संभव नहीं है।”









